राधाष्टमी : कथा, व्रत व पूजा विधि

सनातन  धर्म में भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के नाम से मनाया जाता है। इस बार 6 सितम्बर को मनाया जाएगा। राधाष्टमी के दिन श्रद्धालु बरसाना की ऊँची पहाडी पर स्थित गहवर वन की परिक्रमा करते हैं। इस दिन रात-दिन बरसाना में बहुत रौनक रहती है। ये तो सभी जानते है कि राधा कृष्ण की प्रिया थी। राधा के बिना कृष्ण अधूरें है। कृष्ण की शक्ति राधा है।




• शक्ति की अवतार राधा -
राधा व्रषभानु की पुत्री ही नही शक्ति का अवतार थी। वेदों में इसका वर्णन है कि शक्ति के तीन अवतार माने गए है यानि की पार्वती, सीता और राधा।

• राधाष्टमी कथा -
राधाष्टमी कथा, राधा जी के जन्म से संबंधित है। राधा जी का जन्म वरदान के रूप में बृषभान के घर हुआ था। इनका जन्म रावलग्राम में हुआ था जो गोकुल के पास है, लेकिन कुछ दिन बाद राधा के पिता ने वृंदावन में व्रषभानु पुरा गांव बसाया जो आज बरसाना नाम से जाना जाता है। यही बरसाना राधा जी का ग्रह भूमि है। यह वही जगह है जहां पर राधा जी का अधीश्वरी के रुप में महाभिषेक हुआ था। के समय सभी देवी-देवता वहां उपस्थित और राधा जी को स्वर्ग सिंहासन में बैठाया गया, लेकिन आसित करते समय सभी के मन में यह प्रश्न आया कि राधा रानी पूरें ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी है तो फिर उन्हें सोलह कोस में फैले वृंदावन का आधिपत्य सौपनें की क्या जरुरत है। काफी विचार-विमर्श के साथ यह निर्णय हुआ कि बैकुंठ से ज्य़ादा महत्व मथुरा का है तो इससे ज्यादा महत्व वृंदावन का होगा। महाभिषेक में सभी देवी-देवताओं से रगदान के रुप में कुछ न कुछ दिया। सावित्री नें पद्ममाला, इंद्र पत्नी शची ने सवर्ण सिहांसन, कुबेर की पत्नी मनोरमा ने रत्नालकार, वरुण की पत्नी प्रिया गैरी ने दिव्य छत्र, पवन पत्नी शिवा ने यामर-युगल आदि दिए।

• राधा जी की सखियां-
राधा जी की सेवा में  हजारो सखियों में कुछ का स्थान सर्वोपरि है। जिनका नाम श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चिना, श्री रंग देवी, श्री तुंगा विघा आदि थी। इन्ही सखियों में वृंदावन का अष्ट सश्वी मंदिर बना है।
राधा जी कृष्ण से आठ साल बड़ी थी, लेकिन कुछ लोगो का कहना है कि इन दोनें की उम्र में केवल 15 दिनों के अंतर है। जहां कृष्ण का जन्म भाद्र कृष्ण अष्टमी को हुआ वही राधा का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ। जिस तरह श्री कृष्ण का जन्म का वर्त-पूजन बडी श्रृद्धा के साथ किया जाता है उसी तरह राधाष्टमी की पूजा करनी चाहिए। इस दिन दोनों का साथ-साथ पूजा करनी चाहिए।

• ऐसे करे राधाष्टमी पर राधा जी की पूजा-
राधाष्टमी में सबसे पहले राधाजी को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए और उनका विधिवत रुप से श्रृंगार करना चाहिए। इस दिन मंदिरों में 27 पेड़ों की पत्तियों और 27 ही कुंओं का जल इकठ्ठा करना चाहिए। सवा मन दूध, दही, शुद्ध घी तथा बूरा और औषधियों से मूल शांति करानी चाहिए। बाद में कई मन पंचामृत से वैदिक मम्त्रों  के साथ "श्यामाश्याम" का अभिषेक किया जाता है।
                          नारद पुराण के अनुसार 'राधाष्टमी' का व्रत करनेवाले भक्तगण ब्रज के दुर्लभ रहस्य को जान लेते है। जो व्यक्ति इस व्रत को विधिवत तरीके से करते हैं वह सभी पापों से मुक्ति पाते हैं।

राधाष्टमी के दिन शुद्ध मन से व्रत का पालन किया जाता है। राधाजी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराते हैं स्नान कराने के पश्चात उनका श्रृंगार किया जाता है। राधा जी की सोने या किसी अन्य धातु से बनी हुई सुंदर मूर्ति को विग्रह में स्थापित करते हैं। मध्यान्ह के समय श्रद्धा तथा भक्ति से राधाजी की आराधना कि जाती है। धूप-दीप आदि से आरती करने के बाद अंत में भोग लगाया जाता है। कई ग्रंथों में राधाष्टमी के दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त रुप से पूजा की बात कही गई है।

•राधाष्टमी का महत्व-
वेद तथा पुराणादि में राशाजी का ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वही कृष्णप्रिया हैं। राधाजन्माष्टमी कथा का श्रवण करने से भक्त सुखी, धनी और सर्वगुणसंपन्न बनता है, भक्तिपूर्वक श्री राधाजी का मंत्र जाप एवं स्मरण मोक्ष प्रदान करता है। श्रीमद देवी भागवत श्री राधा जी कि पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो भक्त श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार भी नहीं रखता। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं।
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