कब आते है भगवान? (अंतर्मन की पुकार)

शब्द जब निस्वार्थ प्रेम, त्याग व् समर्पण से ओतप्रोत होता है और जब वह निराकार से सहायता पाने का भाव रखता है तो वह प्रार्थना बन जाता है। वास्तव में प्रार्थना विश्वास का विधान है। प्रार्थना एक प्रेरक शक्ति है, जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से जूझने का साहस व सहारा देती है। प्रार्थना भावपूर्ण ह्रदय से निकली एक ऐसी पुकार है जिसका व्यक्ति के अवचेतन मन पर सकारत्मक प्रभाव पड़ता है। प्रार्थना ईश्वरीय शक्ति की कृपा के लिए भक्त के व्याकुल ह्रदय से निकली ऐसी पुकार है जो उसको सब प्रकार के संतापो  से मुक्त कर उसे सुरक्षा कवच प्रदान करती है।



महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार,  द्रौपदी ने योगेश्वर श्री कृष्ण से एक प्रश्न किया, ' हे परमसुख जब दुःशासन भरी सभा में मेरी साड़ी खींच रहा था और मैं आपको पुकार रही थी तो आपने आने में इतनी देर क्यों कर दी?' भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी चिर-परिचित  मुस्कान के साथ कहा, ' देवी मैं तो तुम्हारी पुकार सुनते ही आ गया था' किन्तु तुम पुकार तो मुझे रही थी लेकिन देख अपने पतियो की ओर रही थी कि शायद ये मेरी रक्षा करे । तुमने जब उनसे दृष्टि हटायी तो मैं आगे बढ़ा किन्तु मैं  यह देख कर ठहर गया कि अब तुम पितामह भीष्म और गुरु द्रौण की ओर देख रही थी। फिर तुम अपने हाथो के सामर्थ्य पर भरोसा कर स्वयं को बचाने का प्रयत्न करने लगी। किन्तु हे! कृष्णे जब तुमने दोनों हाथ उठा कर भावयुक्त ह्रदय से केवल और केवल मुझे पुकारा तो मैं उसी समय कौरवो की सभा में अदृश्य महाशक्ति के रूप में उपस्थित हो गया।'

श्री कृष्ण ने द्रौपदी को समझाते हुए कहा, कल्याणी मेरा सिद्धांत है की जब व्यक्ति अनन्य भाव से शरणागत हो कर आर्तनाद  करता है तो मुझे उसकी रक्षा के लिए आना ही पड़ता है।'
जिस विराट के संकेत मात्र से नदियो की अविरल धारा प्रवाहित होती है,शीतल और सुगन्धित हवा चलने का अहसास होता है उसी असीम एवम् अनंत सत्ता के प्रति व्यक्ति का सिर जब श्रद्धा भाव से झुक जाता है, तब प्रार्थना होती है। प्रार्थना से आंतरिक शक्ति उत्पन्न होती है। प्रार्थना से बड़ी सहायक शक्ति दूसरी  नही है ।

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