मकर संक्रांति : कथा , पूजा विधि, दान माहत्म्य (सम्पूर्ण विवरण)

पौष मास में जब सूर्य देवता धनु राशि को छोड कर मकर राशि में प्रवेश करते है, तभी मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण हो जाते है इसलिए इसे उत्तरायणी पर्व भी कहा जाता है। भारतीय धर्म साहित्यों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा जाता है।



मत्स्य पुराण और स्कन्द पुराण में मकर संक्रांति के विषय में विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देवतागण पृथ्वी पर आते है। पौष माह में देवगण सो जाते है,  इसलिए इस माह में कोई मांगलिक कार्य नही होते है। लेकिन माघ मास में  मकर संक्रांति के दिन देवगण चैतन्य हो जाते है और सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते है। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य का अर्थ है- सबको प्रेरित करने वाले, सबको प्रकाशित करने वाले।

मान्यता है की मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे  चल कर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुऐ सागर में मिली थी
यही कारण है की मकर संक्रांति के दिन गंगासागर का महासंगम होता है। पूर्वजो के तरण तारण के लिए इस दिन की तिथि उत्तम होती है, तभी तो भगीरथ ने आज के दिन तर्पण कर अपने पूर्वजो को तृप्त किया था।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य देवता अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते है, जो मकर राशि के स्वामी है इस कारण संक्रांति को मकर संक्रांति कहते है

ऋग्वेद के देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद  के अनुसार ''चक्षौ सूर्यो जायत'' यानि सूर्य को भगवान का नेत्र माना गया है।
गायत्री मन्त्र भी सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को सम्पूर्ण जगत की उत्पति का एक मात्र कारण बताया गया है। 

 भविष्य पुराण में ब्रह्मा और विष्णु के बीच एक संवाद में सूर्य पूजा और मंदिर निर्माण का महत्व बताया गया है। कई पुराणों में यह उल्लेख मिलता है कि ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण कुष्ठ रोग से पीड़ित हुए भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस  रोग से मुक्ति पायी थी ।

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है - 
 "आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।"
अर्थात मैं अदिति के बारह पुत्रो(देवो) में विष्णु और संसार की सारी ज्योतियों में किरण युक्त सूर्य हूं, तथा वायुगण में मरीचि तथा नक्षत्रो में चन्द्रमा हूं।

 ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि सूर्य अपने उपासक के सामने उपस्थित हो कर उसकी इच्छा पूरी करते है। उनकी कृपा से मनुष्य के  मानसिक वाचिक तथा शारीरिक सभी पाप नष्ट हो जाते है।

महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपना शरीर त्यागने के लिए इसी दिन को चुना था, तो नए ज़माने में स्वामी विवेकानंद का जन्म भी इसी दिन हुआ था।
कथा है की आज ही के दिन भगवान् विष्णु ने मय नामक असुर का वध कर के युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी और असुरो को समुद्र मंथन की मथनी अर्थात मन्दार पर्वत में दबा दिया था। एक और कथा है  कि यशोदा ने श्री कृष्ण को पाने के लिए  आज के ही दिन व्रत सम्पन्न किया था

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मकर संक्रांति के दिन  तमिलनाडु क्षेत्र में  'पोंगल' तो आंध्र प्रदेश , कर्नाटक व केरल में  संक्रांति पर्व का विशेष महत्व होता है। उत्तर भारत के पंजाब हरियाणा क्षेत्र में  एक दिन पहले लोहड़ी की धूम रहती है तो बंगाल और राजस्थान के समाज में आज चौदह अंक से जुड़े दान का विशेष महत्व होता है । पूर्वोत्तर सहित असम के प्रधान उत्सव बिहू(जो साल में तीन बार तीन नाम से मनाया जाता है) में माघी बिहू मकर संक्रांति के ही दिन मनाया जाता है।

भारतीय परम्परा में दान को अतिमहत्वपूर्ण माना गया है। कहा गया है- 'दान दिये सो होये सुखारा'  और दान का महापर्व है मकर संक्रांति । इस दिन पुरे देश में अन्न, वस्त्र, द्रव्य के साथ घी , कम्बल अथवा तिल से बने सामान और तिल का दान दिया जाता है। यही दिन है जब , तिल का स्नान तिल का दान और तिल का ही नेमान(प्रथम भोजन) की परम्परा रही है

-मकर संक्रांति के दिन कैसे करे सूर्य उपासना(पूजा)-

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान आदि से निवृत्त हो सूर्योदय के समय ताम्र पात्र में जल, कुमकुम, अक्षत, लाल पुष्प(कनेर) आदि डाल कर इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीन बार अर्घ्य दें 

मन्त्र
ऐहि सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो  राशि जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर।
सूर्याय नमः आदित्याय नमः 
नमो भास्कराय नमः अर्घ्य समर्पयामि।

इसके बाद निम्न लिखे मंत्रो में से किसी भी मन्त्र की 11 मालाजाप और तिल व गुड़  में गाय के घी का मिश्रण कर अग्नि में 108 आहूतियां अवश्य देनी चाहिए,

• ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
• ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः।
• ॐ घृणि आदित्याय सूर्याय नमः।
• ॐ सप्त-तुरंगाय विद्महे सहस्र- किरणाय धीमहि तन्नो रविः
   प्रचोदयात्.




सूर्य उपासना में माणिक्य, सोना, तांबा, गेंहू, तिल, लाल कपडा, केसर, मूंगा, लाल गाय, लाल चन्दन आदि का दान सूर्योदय के समय करने से विशेष फल मिलता है। साथ ही मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान , गंगा सागर  में स्नान विशेष महत्व रखता है।।

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