पदावली : विकास अग्रवाल (वृन्दा सखी)

पदावली
विकास अग्रवाल(वृन्दा सखी)


पद - Vikas Aggarwal

माई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल
मन्द मन्द हँसत, हँस हँस लुटावत अधर रस,होइ में बेहाल i
दै दै तारि, बुलावत बनवारी,तभी छिप जावै नन्द लाल.....ii
माई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल
इत-ऊत डोलत,बोली तोतरि बोलत,हरत हृदय जंजाल.......i 
चरण सुकोमल फिरत मोरे अंगना,नचावत मोहे निढाल   ii
मामाई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल........
नाम बसों श्वास में श्वास ही नाम, मिट गयो सब अंतराल...i 
बैरी जगत सौ नाता छूट गयो,मिट्यो सब भरमजाल......ii
माई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल
देख्यो जब ते रूप मनोहर रह्यो नही कोई ख्याल......i 
भूख प्यास की सुधि नही मोहि.मन भूल्यो सब चाल....ii
माई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल
कहे वृंदा सखी जा मन बसी या मनमोहन छवि रूप -रसाल.....i 
कछु और न भावै रहे बस नित श्याम सूंदर को ख्याल.........ii
माई री ! मनै ठग लियो गुपाल, हाँ ! री ठग लियो गुपाल
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माई री! मैं तो बुला बुला के हरी जी को हारी ....
कौन विधि किन्ही मीरा बाई जो कभी हार न मानी .....
ऐसो कौन सौ मन्त्र माई री जो मैं पगली नही जानी.......
भरी सभा के बिच दुशाशन करत द्रोपदी उघारी 
द्रुपद सुता जैसे ही पुकारा चिर बढ्यो अति भारी 
गज,गणिका,अजामिल तारे देर क्यों लगी मेरी बारी ...... 
माई री! वृंदा सखी बुला बुला के हरी जी को हारी
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निठुर भये श्याम तुम, तोरा हिय ना पसीजे रे,
भूल गए हम सखियन को, तुम कठोर भये रे ....
याद है तुमको या बिसर गए हंससुता की सूंदर रजनी 
शरद ऋतू की चांदनी रात, रास रचाया जब हितसजनी
ऐसी क्या भूल हुयी हमसौं, जो तुम नही आय मिले रे ....
कहे वृंदा सखी,पहिले प्रेम पाश में बांध लिया, अब क्यों भूल गए रे....
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अति अगाध हिये पीर व्यापै तुम विरहाग्नि घनश्याम i
क्षण क्षण जरावत कलेजा मोरा पीर असह्य मेरे श्याम II
इत-उत धावत पांबन मेरे डोलत  गिरत कभी धरा धराम I
अंतर क्षुधा की सुधि नाहीं अब देह छुटे यह हो मन विश्राम I I
बीत गया जीवन निरर्थक सारा तुम हो अर्थ मेरे सुखधाम I
कहे वृंदा सखी नेह आलिंगन निज करकमलो में लेलो घनश्याम I  I
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प्रेम का मौल विरह ताप री सजनी, विरह मौल प्रेम रस-सार
गोपी प्रेम सऊ भई रे बावरी विरह लियो, जोड़ मोहन संग तार    
कँटीली सेज है प्रेम सखी री, जित मीरा लियो सुख बारम्बार
समा गयी गिरधर हृदय माहीं, हो गयी भव सागर सौ पार
कहे वृंदा सखी लगे ऐसा प्रेम बाण, नस नस बहे विरह धार
आओ गिरधर थाम लो दामन मेरा, ले संग चलो परली पार

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मेघा बरस रहे प्रेम रस सऊ आग लगे विरहणी के तन- मन
विरह-ताप से अकुलाई विरहणी देखो भटकत है मन मोहन
बोलत मोर मराली दादुर पपीहा गावत प्रेम तराना ये पवन
विरहणी सुलगे तृण के जैसे और यह पवन बढ़ावे हिय अग्न
इंद्रधनुष की सतरंगी आभा सात रंगों की फहरावे प्रेम पतंग
देखि  देखि  यह प्रेम की लीला अकुलावे मोरे सब अंग- अंग
क्षितिज शोभा प्रेममयी ऐसी तड़पुं देखि धरा अम्बर मिलन
वृंदा सखी भई रे बावरी अब आन मिलो मेरे प्यारे नंदनंदन

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  1. माई री! मैं तो बुला बुला के हरी जी को हारी ....
    कौन विधि किन्ही मीरा बाई जो कभी हार न मानी .....
    ऐसो कौन सौ मन्त्र माई री जो मैं पगली नही जानी.......
    भरी सभा के बिच दुशाशन करत द्रोपदी उघारी
    द्रुपद सुता जैसे ही पुकारा चिर बढ्यो अति भारी
    गज,गणिका,अजामिल तारे देर क्यों लगी मेरी बारी ......
    माई री! वृंदा सखी बुला बुला के हरी जी को हारी

    :) Balihaar

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