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गोपी गीत : श्लोक 10-12 [ आत्मभाव ]

गोपी गीत श्लोक 10,11,12,13 &14 Meaning Vikas aggarwal Gopi Krishna Love Sadness

गोपी गीत श्लोक अर्थसहित
गोपी आत्मभाव
श्लोक 10-14
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-श्लोक-10-
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10॥

-भावार्थ-
(हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी। अर्थात गोपियाँ अपने मन की दशा व्यक्त कर रही है की हे मन मोहन ! जब आपसे हमारा मिलन नही हुआ था तभी हम प्रसन्न थी, आपकी विभिन्न लीलाओं के माध्यम से आपका ध्यान करती थी और उन लीलाओं के रोमांच से ही हमे बहुत आनंद मिल जाता था,हमने कभी ऐसे प्रेम का आस्वादन छह ही नही था हम तो उसी में खुश थी,कभी माखन चोरी की लीला, कभी दामोदर लीला,तो कभी गोचारण लीलाओं के ध्यान से ही हमारा मंगल हो जाता था, हमने कभी विरह वेदना के बारे में सोचा ही नही था, उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है, किन्तु है निष्ठुर प्रेमी ! आपने ही हमे इस प्रेम का आस्वादन करवाया, तुम मिले।


तुमने एकांत में ह्रदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं। जिस प्रेम का हमे अनुमान ही नही था, उस प्रेम बंधन में आपने हम सब को बाँध लिया, हमे अपने प्रेम , रूप और चंचल चितवनि के पाश में बाँध लिया, बहुविधि प्रेम क्रीड़ाय की,और हमारे हृदय के सरताज बन गए, अब हम आपकी इतनी आदी हो चुकी है की पल भर का बिछुड़ना भी वर्षों का ताप लगता है, यह बिछोह हमारे प्राणों को दशन चाहता है, हम मरणासन्न हो गयी है, हे छलिया ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं। अगर नेहड़ा लगाकर यु तड़पने के लिए छोड़ देना था तो हमे ऐसा प्रेम सिखलाया ही क्यों? आपके बिना हमारा क्या हाल बेहाल हो गया है कैसे समझाए आपको.


"तेरे बिन जियूँ कैसे
ये शब्दों से बयां क्या करना
रेत पर ला के मछलियाँ रख दो
तुम बिन मैं कैसी हुँ जान जाओगे"

 आपको एहसास भी नही होगा इस बात का की हम कैसे तड़प रही है क्योंकि कहि दूर जाकर आप तो छिप गए है, अगर हमारी दीनहीन दशा की जरा भी परवाह है तो आइये हमारे नजदीक आकर देखिये,

"दूरियां कितना देती है दर्द मेरे दिल को इश्क का तेरे
यु दूर रहकर कैसे एहसास होगा? तुझे दिल ऐ दिलबर !
मेरे नजदीक आ के देख मेरे दिल ऐ अहसास की शिद्दत,
ये दिल कितना तेज धड़कता है,, सिर्फ तेरा नाम आने पर,"
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Read Here - प्रथम श्लोक ।। द्वितीय श्लोक ।। 
।। तृतीय श्लोक ।।
।। 4-8 श्लोक ।। नवम श्लोक ।।
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-श्लोक-11-
चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11॥

-भावार्थ-
हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं। गोपियाँ क्या कहती है की

कमल नयन कमल मुख जिनके कर कमलो से हैं....
करत कलोल प्रियप्रितम कमलन के कुंजन में हैं ....
कमल के ही वसन भूषण श्रृंगार सकल कमलन के हैं 
कमल रूप निहार केलि का भाव सभी कमली से हैं.....

 हे मधुसूदन ! आपके चरणों की महिमा कैसे बताये जिन चरणों को लक्ष्मी जी अपने आँचल से पोंछती रहती है, जिन चरणों को पवित्र गंगा जी प्रक्षiलन करती है, जिन चरणों को राजा बलि ने अपने मस्तक पर धारण किया है,उन्ही कमल के समान सुकोमल चरणों से  जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है ।


हमें बड़ा दुःख होता है, गोपियाँ अपने दिल के कोने कोने से ऐसी पीड़ा उद्वेलित कर रही है की क्या वर्णन हो? प्रभु के एक एक अंग एक एक लीला का वर्णन करके वास्ता देकर यही बताना चाहती है की उनको वः इतना प्रेम करती है की तिल मात्र भी कोई कष्ट आपको होता है तो हमे हज़ार गुना पीड़ा होती है, बार बार गोपी विरह वेदना का वास्ता देती है, कभी विनती करती है, कहि कठोर हो जाती, कभी समझने मनाने के लिहाज से बोलती है तो कहि उल्हाना देती है,


"सरद समै हु श्याम न आये
को जानै काहे तै सजनी, किहि बैरिनि बिरमाये
अमल अकास कास कुसुमित छिति लच्छन स्वच्छ बनाये
सर-सरिता-सागर-जल उज्जल अति कुल कमल सुहाए
अहि मयंक, मकरंद कंज, अलि दाहक गरल जिवाये
प्रीतम रंग संग मिली सुन्दरि, रचि सचि सींचि सिराये
सुनी सेज तुषार जगत चिर बिरह-सिंधु उपजाए
अब गई आस सुर मिलिबे की,भये ब्रजनाथ पराये"
धन्य है गोपी प्रेम, धन्य इनके वचन धन्य इनका तप, है गोपी आप धन्य धन्य धन्य है,
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-श्लोक-12-
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12॥

-भावार्थ-
हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं की तुम्हारे मुख कमल पर नीली नीली अलकें लटक रही हैं जैसे बादलो के मध्य विद्युत् की रेख से दिखाई देती है ऐसे ही आपके नीलवर्ण मुख कमल पर लटकती हुयी अलके प्रतीत हो रही है, जैसे किसी सूंदर वृक्ष से लताये  लटकती हुयी सूंदर दिखती है ऐसे ही आपका मुख कमल सोभायमान हो रहा है, और गौओं के खुर से उड़ उड़कर घनी धुल पड़ी हुई है। धूलधूसरित आपका चेहरा बादलो की सी चटाये लिए हुए है जैसे आकाश में कहि नीलवर्ण कहि स्वेत नज़र आता है ऐसे ही आपका मुख नज़र आता है,


धूरि भरे अति शोभित श्यामजू तैसी, बनी सिरसुंदर चोटी।
खलत खात फिरे अंगना पग पैजनी, बाजति पीरी कछोटी।
वा छवि को रसखान विलोकत वरात, काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सौं, ले गयो माखन रोटी।।


तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखा दिखाकर हमारे ह्रदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हो। हम आपकी ऐसी मनोहारी छबि पर बार बार वारि जाती है इसे देखकर आपको पाने की लालसा हमे और अधिक तड़प देती है,
"
"तेरे रूप की माधुरी ने ऐसा घायल कर दिया
जो दिल हमारा अपना था वो तुमने अपना कर लिया
चलती हैं जो धड़कने दिल में पहले तो थी जीने के लिए
अब धड़कती हैं तभी जब जब तेरा नाम लिया"
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-श्लोक-13-
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13॥

-भावार्थ-
हे प्रियतम ! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो। एक विरहणी को यदि प्रेमी की एक झलक मिल जाए उसके प्रेम की एक बून्द ही मिल जाती है तो वः अमृत स्वरूप कार्य करती है जैसे किसी मरणासन्न जीव की जिव्हा पर अमृत की एक बून्द डाल दी जाये तो वह  पुनः जीवित हो जाता है, ऐसे ही आपका दर्शन हम सब के प्राणों की रक्षा करने वाला अमृत है हे मधुप! आप हमारी रक्ष कीजिये, तुम्हारे चरण कमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले है। न जाने कितने उद्धरण आपकी करुणा के है जिन्होंने भी आपकी शरणागति ग्रहण की उन सबका आपने उद्धार किया है,

"गणिका गज गीध अजामिल से,
तुम तारि दियो सुनि मैं भी लुभायो।
सुनि और कथा बहु पापी तरे,
धुन्धकारी के हेतु विमान पठायो ।
बड़ पापी से पालो पड्यो अब है,
मोहे तारि उबारि क्यो देर लगायो।
शिवदीन कहे इन बातन को,
सुनि के श्रवना शरणागत आयो।"

हे प्राणप्यारे! अब हमारे प्राण संकट में है तो आप कहा छुपकर बैठ गए है, स्वयं लक्ष्मी जी आपके चरणों की  सेवा करती हैं ।और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं । अर्थतः केवल और केवल आपके चरणों की शरण ही आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिंतन करना उचित है जिससे सारी आपत्तियां कट जाती हैं। आपके चरणों को कष्ट भी न हो और हमारा भी कल्याण हो जाए इसी लिए हम आपसे विनती करती है की ,

 हे कुंजबिहारी ! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरूप चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की व्यथा शांत कर दो।।आपके यह चरण बहुत नाजुक और कोमल है आप इन्हें हमारे वक्ष पर रखिये जिससे आपके चरणों को परिश्रम भी न होगा और हमारे हृदय में दहकती, कालकूट विष के समान हमारे प्राणों को हर लेने वाली विरहाग्नि को शांत कीजिये,
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-श्लोक-14-
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14॥

-भावार्थ-
इस बार गोपियो की मांग और अधिक बड़ी हो गयी वो कह रही है हे श्यामसुंदर! आपके अधर गुलाब की पंखुडियो के समान लालिमा लिए और मकरन्द से परिपूर्ण प्रतीत होए है, जैसे भंवरा बावरा हुआ गुलाब से मकरन्द निकलने को पंखुड़िया चूमता रहता है ऐसे ही हम भी आपके गुलाब रूपी अधरों से अधररसपान को लालायित हो रही है, हे वीर शिरोमणि ! तुम्हारा अधरामृत मिलन के सुख को को बढ़ाने वाला है।

 हम सब को अतिरेक आनंद प्रदान करने में यह सहायक है आठ आप आइये और हमे ऐसा परम् सुख प्रदान कीजिये, वह विरहजन्य समस्त शोक संताप को नष्ट कर देता है। आपके विरह के कारन जो दहकता हुआ विष हमारे अंदर प्रवाहित हो रहा है उसकी उष्णता को शांत करने के लिए आपका अधरामृत ही एक संजीवनी औषधि है, जैसे यह मुरली जैसे ही आपके अधर से स्पर्श करती है तो इसके पौर पोर से अमृत जैसा संगीत निकलने लगता है, यह बहुत भाग्यशाली है जो सदैव आपके अधरों से अमृत का पान करती रहती है, कभी कभी हमे इससे ईर्ष्या होने लगती है की हमारा भाग ऐसा क्यों नही है,यह गाने वाली बांसुरी भलीभांति उसे चूमती रहती है ।जिन्होंने उसे एक बार पी लिया, उन लोगों को फिर अन्य सारी आसक्तियों का स्मरण भी नहीं होता। ऐसा कोण अभागा होगा जिसने इस अमृत को पान करने के बाद कोई और लालसा मन में रखी हो अर्थात जीव की सभी अभिलाषाएं शांत हो जाती है, फिर कोई कामना शेष नही रह जाती आप हम सब पर कृपा करके आप अपना वही अधरामृत हमें पिलाओ।। जिससे फिर और कोई कामना हमारी शेष न रह जाए,हम मुग्ध होकर आपके रसपान से आनंदित होती रहे, जैसे मदिरा पिने वाले को मदिरा पिने के बाद कोई होश नही रहता हम भी वैसे ही केवल केवल आपके ध्यान में रहना चाहती है हमे किसी और वस्तु की चाह नही है
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गोपी गीत : श्लोक 10-12 [ आत्मभाव ]
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