Mahabharat : महाप्रस्थानिक [स्वर्गारोहण]

महाभारत रहस्य (महाप्रस्थानिक पर्व)

महाभारत अति रहस्यपूर्ण ग्रन्थ है जो की हर पहलू से रहस्यो से परिपूर्ण है और इसी का एक पहलू महाप्रस्थानिक पर्व जिसमे अनेक रहस्यो का उद्घाटन किया है,जैसे क्यों पांडवो को नरक और कोरवो को स्वर्ग मिला? क्यों युधिस्ठिर को छोड़कर अन्य पांडवो और द्रोपदी की स्वर्गारोहण की यात्रा अधूरी रह गयी? क्यों सिर्फ युधिष्ठिर ही स्वर्ग पहुंच पाए और क्यों सबसे पहले द्रौपदी की मौत हुई? इन सब प्रश्नों के जवाब जाने इस लेख के द्वारा जो की महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व पर आधारित है।




कहते हैं कुरुक्षेत्र में हुए इस युद्ध में इतने लोगों की जाने गईं, इतना खून बहा कि यहां की मिट्टी का रंग आज तक लाल है। महाभारत की घटना के दौरान क्या हुआ इसका जवाब तो सभी के पास है लेकिन महाभारत के युद्ध की समाप्ति और इसमें पांडवों की विजय के बाद हालात क्या रहे, हस्तिनापुर के शासन का क्या हुआ,? इस बात का जिक्र कम ही होता है। चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौरवों के अंत और कृष्ण की मृत्यु के पश्चात पांडवों के शासन का क्या हुआ।

जनमेजय ने पूछा –ब्रह्मन! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंश के बीरों में मूसलयुद्ध होने का समाचार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम पधारने के पश्चात पाण्डवों ने क्या किया ?

वैशम्पायन जी ने कहा – राजन! कुरूराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार वृष्णिवंशियों के महान संहार का समाचार सुना तब महाप्रस्थान का निश्चय करके अर्जुन से कहा -। ‘महामते! काल ही सम्पूर्ण भूतों को पका रहा है – विनाश की ओर ले जा रहा है।अर्थात काल सर्वविजयी है इसे नकारा नही जा सकता, जिसने जन्म लिया है उसे अवश्य ही काल के मुख में जाना पड़ेगा अर्थात नश्वर देह का त्याग करना पड़ेगा, अब मैं काल के बन्धन को स्वीकार करता हूँ। तुम भी इसकी ओर दृष्टिपात करो ‘। भाई के ऐसा कहने पर कुन्तीकुमार अर्जुन ने ‘काल तो काल ही है , इसे टाला नहीं जा सकता ‘ ऐसा कहकर अपने बुद्धिमान बड़े भाई के कथन का अनुमोदन किया। अर्जुन का विचार जानकर भीमसेन और नकुल-सहदेव ने भी उनकी कही हुई बात का अनुमोदन किया। तत्पश्चात धर्म की इच्छा से राज्य छोड़कर जाने वाले युधिष्ठिर ने वैश्यापुत्र युयुत्सु को बुलाकर उन्हीं को सम्पूर्ण राज्य की देख-भाल का भार सौंप दिया। फिर अपने राज्य पर राजा परीक्षित का अभिषेक करके सम्पूर्ण राज्य उन्हें सोंप दिया , ‘परीक्षित हस्तिनापुर में राज्य करेंगे और युदवंशी वज्र ( श्रीकृष्ण के पोत्र) इन्द्रप्रस्थ में।ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर ने भाइयों-सहित आलस्य छोड़कर बुद्धिमान भगवान श्रीकृष्ण, बूढे मामा वसुदेव तथा बलराम आदि के लिये जलाञ्जलि दी और उन सबके उद्देश्य से विधिपूर्वक श्राद्ध किया।
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प्रयत्नशील युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण के उद्देश्य से द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, तपोधन मार्कण्डेय, भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि को सुस्वादु भोजन कराया। भगवान का नाम कीर्तन करके उन्होंने उत्तम ब्राह्मणों को नाना प्रकार के रत्न, वस्त्र, ग्राम, घोड़े और रथ प्रदान किये। बहुत –से ब्राह्मणशिरोमणियों को लाखों कुमारी कन्याएँ दीं। तत्पश्चात गुरुवर कृपाचार्य की पूजा करके पुरवासियों सहित परीक्षित को शिष्य भाव से उनकी सेवा में सौंप दिया। इसके बाद समस्त प्रकृतियों (प्रजा-मन्त्री आदि) –को बुलाकर रार्षि युधिष्ठिर ने, वे जो कुछ करना चाहते थे अपना वह सारा विचार उनके कह सुनाया। उनकी वह बात सुनते ही नगर और जनपद के लोग मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होंने उस प्रस्ताव का स्वागत नहीं किया। वे सब राजा से एक साथ बोले – ‘आपको ऐसा नहीं करना चाहिये (आप हमें छोड़कर कहीं न जायँ )’। परंतु धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर काल के उलट-फेर के अनुसार जो धर्म या कर्तव्य प्राप्त था उसे जानते थे; अत: उन्होंने प्रजा के कथनानुसार कार्य नहीं किया। उन धर्मात्मा नरेश ने नगर और जनपद के लोगों को समझा-बुझाकर उनकी अनुमति प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने और उनके भाइयों ने सब कुछ त्यागकर महाप्रस्थान करने का निश्चय किया। इसके बाद कुरूकुलरत्न धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपने अंगों से आभूषण उतारकर वल्कलवस्त्र धारण कर लिया। नरेश्वर! फिर भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यशस्विनी द्रौपदी देवी – इन सबने भी उसी प्रकार वल्कल धारण किये। भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणों से विधिपूर्वक उत्सर्गकालिक इष्टि करवाकर उन सभी नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने अग्नियों का जल में विसर्जन कर दिया और स्वयं वे महायात्रा के लिये प्रस्थित हुए। महाराज युधिस्ठिर जोकि धर्मराज ही है केवल वे ही ऐसा महाप्रयाण सोच सकते है, स्वेच्छा से अपनी देह का धर्मपूर्वक त्याग करना, आज के भौतिक युग में धर्मदृष्टि से तो क्या कोई यह जानकर भी की मरना तो है मरना नही चाहता,सदैव मृत्यु से जितना चाहता है,किन्तु यह असम्भव है,

युधिष्ठिर का अभिप्राय जान और वृष्णिवंशियों का संहार देखकर पाँचों भाई पाण्डव, द्रौपदी और एक कुत्ता – ये सब साथ-साथ चले। उन छहों को साथ लेकर सातवें राजा युधिष्ठिर जब हस्तिनापुर से बाहर निकले तब नगरनिवासी प्रजा और अन्त:पुर की स्त्रियाँ उन्हें बहुत दूर तक पहुँचाने गयीं; किंतु कोई भी मनुष्य राजा युधिष्ठिर से यह नहीं कह सका कि आप लौट चलिये। धीरे-धीरे समस्त पुरवासी और कृपाचार्य आदि युयुत्सु को घेरकर उनके साथ ही लौट आये। जनमेजय! नागराज की कन्या उलूपी उसी समय गंगाजी में समा गयी। चित्रांगदा मणिपुर नगर में चली गयी। तथा शेष माताएँ परीक्षित को घेरे हुए पीछे लौट आयीं। कुरूनन्दन! तदनन्तर महात्मा पाण्डव और यशस्विनी द्रौपदी देवी सब-के-सब उपवास का व्रत लेकर पूर्वदिशा की ओर मुँह करके चल दिये। वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्यागधर्म का पालन करने वाले थे। उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रों की यात्रा की। 

आगे-आगे युधिष्ठिर चलते थे। उनके पीछे भीमसेन थे। भीमसेन के भी पीछे अर्जुन थे और उनके भी पीछे क्रमश: नकुल और सहदेव चल रहे थे। भरतश्रेष्ठ! इन सबके पीछे सुन्दर शरीरवाली, श्यामवर्णा, कमलदललोचना, युवतियों में श्रेष्ठ द्रौपदी चल रही थी। वन को प्रस्थित हुए पाण्डवों के पीछे एक कुत्ता भी चला जा रहा था।

क्रमश: चलते हुए वे वीर पाण्डव लालसागर के तट पर जा पहुँचे। महाराज! अर्जुन ने दिव्यरत्न के लोभ से अभीतक अपने दिव्य गाण्डीव धनुष तथा दोनों अक्षय तूणीरों का परित्याग नहीं किया था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने पर्वत की भाँति मार्ग रोककर सामने खड़े हुए पु रूषरूपधारी साक्षात अग्निदेव को देखा। तब सात प्रकार की ज्वालारूप जिह्वाओं से सुशोभित होने वाले उन अग्नि देव ने पाण्डवों से इस प्रकार कहा – ‘वीर पाण्डुकुमारो! मुझे अग्नि समझो। ‘महाबाहु युधिष्ठिर! शत्रुसंतापी भीमसेन! अर्जुन! और वीर अश्विनीकुमारो! तुम सब लोग मेरी इस बात पर ध्यान दो। ‘कुरूश्रेष्ठ वीरों! मैं अग्नि हूँ। मैंने ही अर्जुन तथा नारायणस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के प्रभाव से खण्डव-वन को जलाया था। ‘तुम्हारे भाई अर्जुन को चाहिये कि ये इस उत्तम आयुध गाण्डीव धनुष को त्यागकर वन में जायँ।


अब इन्हें इसकी कोई आवश्यकता नहीं है | ‘पहले जो चक्ररत्न महात्मा श्रीकृष्ण के हाथ में था वह चला गया। वह पुन: समय आने पर उनके हाथ में जायेगा। ‘यह गाण्डीव धनुष सब प्रकार के धनुषों में श्रेष्ठ है। इसे पहले मैं अर्जुन के लिये ही वरुण से माँगकर ले आया था। अब पुन: इसे वरुण को वापस कर देना चाहिये ‘। यह सुनकर उन सब भाइयों ने अर्जुन को वह धनुष त्याग देने के लिये कहा। तब अर्जुन ने वह धनुष और दोनों अक्षय तरकस पानी में फेंक दिये। भरतश्रेष्ठ! इसके बाद अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गये अर्जुन जैसा योद्धा और कृष्ण सखा अपने साथ कुछ नही ले जा स्का तो साधारण जीव की क्या हैसियत की वह अपने संग कुछ ले जा सके, अर्थात मानव जीवन भर बहुत कुछ जोड़ता है,वर्षो का सामान भौतिक साधन और फिर उन सबमे मोह रखता है जबकि जानता है यह कुछ भी उसके संग नही जायेगा लेकिन मानता नही है और अंत समय में इसी मोह के कारण अत्यंत पीड़ादायी मृत्यु को प्राप्त होता है,आगे पाण्डववीर वहाँ से दक्षिणाभिमुख होकर चल दिये। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर वे लवणसमुद्र के उत्तर तटपर होते हुए दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होने लगे। इसके बाद वे केवल पश्चिम दिशा की ओर मुड़ गये। आगे जाकर उन्होंने समुद्र में डूबी हुई द्वारकापुरी को देखा। 



द्वारका को देखकर मन दुखी हुआ और सच्चा की स्वयं कृष्ण की नगरी का ऐसा हुआ तो साधारण जीव के भौतिक साधनो की क्या दशा होगी? फिर योगधमें में स्थित हुए भरतभूषण पाण्डवों ने वहाँ से लौटकर पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की।


वैशम्पायनजी कहते हैं – जनमेजय! मन को संयम में रखकर उत्तर दिशा का आश्रय लेने वाले योगयुक्त पाण्डवों ने मार्ग में महापर्वत हितालय का दर्शन किया। उसे भी लाँघकर जब वे आगे बढे तब उन्हें बालू का समुद्र दिखायी दिया। साथ ही उन्होंने पर्वतों में श्रेष्ठ महागिरि मेरू का दर्शन किया। सब पाण्डव योगधर्म में स्थ्ति हो बड़ी शीघ्रता से चल रहे थे। उनमें द्रुपदकुमारी कृष्णा का मन योग से विचलित हो गया; अत: वह लड़खड़ाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। उसे नीचे गिरी देख महाबली भीमसेन ने धर्मराज से पूछा - | ‘परंतप! राजकुमारी द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया था। फिर बताइये, कौन-सा कारण है, जिससे वह नीचे गिर गयी ? ‘

युधिष्ठिर ने कहा – पुरुषप्रवर! उसके मन में अर्जुन के प्रति विशेष पक्षपात था ; आज यह उसी का फल भोग रही है। अर्थात पक्षपात करनेवाले का पतन होता है मनुष्य को कभी पक्षपात न करके केवल सत्य का साथ देना चाहिए अपने पति के लिए पक्षपात करने पर द्रोपदी को स्वर्ग के मार्ग में ही गिरना पड़ा तो साधारण जीव का क्या होगा? वैशम्पायनजी कहते हैं – जनमेजय! ऐसा कहकर उसकी ओर देखे बिना ही भरतभूषण नरश्रेष्ठ बुद्धिमान धर्मात्मा युधिष्ठिर मन को एकाग्र करके आगे बढ गये। थोड़ी देर बाद विद्वान सहदेव भी धरती पर गिर पड़े। उन्हें भी गिरा देख भीमसेन ने राजा से पूछा -। ‘भैया! जो सदा हम लोगों की सेवा किया करता था और जिसमें अहंकार का नाम भी नहीं था, यह माद्रीनन्दन सहदेव किस दोष के कारण धराशायी हुआ है ?’ युधिष्ठिर ने कहा – यह राजकुमार सहदेव किसी को अपने-जैसा विद्वान या बुद्धिमान नहीं समझता था; अत: उसी दोष से इसका पतन हुआ है किसी भी प्रकार का अभिमान भी पतन की और अग्रसर करता है, मनुष्य छोटी छोटी उपलब्धियों पर अभिमान करने लगता है तो उसका उद्धार कैसे सम्भव हो सकता है? वैशम्पायनजी कहते हैं – जनमेजय! ऐसा कहकर सहदेव को भी छोड़कर शेष भाइयों और एक कुत्ते के साथ कुन्तीकुमार युधिष्ठिर आगे बढ गये कृष्णा और पाण्डव सहदेव को गिरे देख शोक से आर्त हो बन्धुप्रेमी शूरवीर नकुल भी गिर पड़े। मनोहर दिखायी देने वाले वीर नकुल के धराशायी होने पर भीमसेन ने पुन: राजा युधिष्ठिर से यह प्रश्न किया - ‘भैया! संसार में जिसके रूप की समानता करने वाला कोई नहीं था तो भी जिसने कभी अपने धर्म में त्रुटि नहीं आने दी तथा जो सदा हम लोगों की आज्ञा का पालन करता था, वह हमारा प्रियबन्धु नकुल क्यों पृथ्वी पर गिरा है ?’

भीमसेन के इस प्रकार पूछने पर समस्त बुद्धिमानों में श्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने नकुल के विषय में इस प्रकार उत्तर दिया - ‘भीमसेन! नकुल की दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूप में मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मन में यही बात बैठी रहती थी कि ‘एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवान हूँ। ‘ इसीिलये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है। अर्थात हमारे कर्म ही हमारे भविष्य का निर्माण करते है, यदि हम कुकर्मो को करते है तो हमे बुरा फल मिलता है और सुकर्मो को करते है तो आचे गति मिलती है, द्रौपदी तथा नकुल और सहदेव तीनों गिर गये, यह देखकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले श्वेत-वाहन पाण्डुपुत्र अर्जुन शोक से संतप्त हो स्वयं भी गिर पड़े इन्द्र के समान तेजस्वी दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह अर्जुन जब पृथ्वीपर गिरकर प्राणत्याग करने लगे उस समय भीमसेन ने राजा युधिष्ठिर से पूछा। ‘ भैया! महात्मा अर्जुन कभी परिहास में भी झूठ बोले हों – ऐसा मुझे याद नहीं आता। फिर यह किस कर्म का फल है जिससे इन्हें पृथ्वी पर गिरना पड़ा ? युधिष्ठिर बोले – अर्जुन को अपनी शूरता का अभिमान था। इन्होंने कहा था कि ‘मैं एक ही दिन में शत्रुओं को भस्म कर डालूँगा’; किंतु ऐसा किया नहींे; इसी से आज इन्हें धराशायी होना पड़ा है। अर्जुन ने सम्पूर्ण धनुधरों का अपमान भी किया था; अत: अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को ऐसा कभी नहीं करना चाहिये। वैशम्पायनजी कहते हैं – राजन! यों कहकर राजा युधिष्ठिर आगे बढ गये। इतने ही में भीमसेन भी गिर पड़े। गिरने के साथ ही भीम ने धर्मराज धर्मराज युधिष्ठिर को पुकारकर पूछा। ‘राजन! जरा मेरी ओर तो देखिये, मैं आपका प्रिय भीमसेन यहाँ गिर पड़ा हूँ। यदि जानते हों तो बताइये, मेरे इस पतन का क्या कारण है ?’

युधिष्ठिर ने कहा – भीमसेन! तुम बहुत खाते थे ओर दूसरों को कुछ भी न समझकर अपने बल की डींग हाँका करते थे; इसी से तुम्हें भी धराशयी होना पड़ा है। यह कहकर महाबाहु युधिष्ठिर उनकी ओर देखे बिना ही आगे चल दिये। एक कुत्ता भी बराबर उनका अनुसरण करता रहा,

वैशम्पायनजी कहते हैं – जनमेजय! तदनन्तर आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रतिध्वनित करते हुए देवराज इन्द्र रथ के साथ युधिष्ठिर के पास आ पहुँचे और उनसे बोले – ‘कुन्तीनन्दन! तुम इस रथपर सवार हो जाओ’ अपने भाइयों को धराशायी हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर शोक से संतप्त हो इन्द्र से इस प्रकार बोले‘देवेश्वर! मेरे भाई मार्ग में गिरे पड़े हैं। वे भी मेरे साथ चलें, इसकी व्यवस्था कीजिये; क्योंकि मैं भाइयों के बिना स्वर्ग में जाना नहीं चाहता। ‘पुरन्दर! राजकुमारी द्रौपदी सुकुमारी है। वह सुख पाने के योग्य है। वह भी हम लोगों के साथ चले, इसकी अनुमति दीजिये |

इन्द्र ने कहा – भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सभी भाई तुमसे पहले ही स्वर्ग में पहुँच गये हैं। उनके साथ द्रौपदी भी है। वहाँ चलने पर वे सब तुम्हें मिलेंगे। भरतभूषण! वे मानवशरीर का परित्याग करके स्वर्ग में गये हैं ; किंतु तुम इसी शरीर से वहाँ चलोगे, इसमें संशय नहीं है | युधिष्ठिर बोले – भूत और वर्तमान के स्वामी देवराज! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है; अत: यह भी मेरे साथ चले – ऐसी आज्ञा दीजिये; क्योंकि मेरी बुद्धि में निष्ठुरता का अभाव है। । इन्द्र ने कहा – राजन! तुम्हें अमरता, मेरी समानता, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है ; अत: इस कुत्ते को छोड़ो और मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है युधिष्ठिर बोले सहस्त्रनेत्रधारी देवराज! किसी आर्यपुरुष के द्वारा निम्न श्रेणी का काम होना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसी लक्ष्मी की प्राप्ति कभी न हो जिसके लिये भक्तजन का त्याग करना पड़े|
इन्द्र ने कहा – धर्मराज! कुत्ता रखनेवालों के लिये स्वर्गलोक में स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवाने का जो पुण्य होता है उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचारकर काम करो। छोड़ दो इस कुत्ते को। ऐसा करने में कोई निर्दयता नहीं है युधिष्ठिर बोले महेन्द्र! भक्त का त्याग करने से जो पाप होता है, उसका अन्त कभी नहीं होता-ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसार में भक्त का त्याग ब्रह्महत्या के समान माना गया है ; अत; मैं अपने सुख के लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्ते का त्याग नहीं करूँगा। जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है – ऐसा कहते हुए आर्तभाव से शरण में आया हो, अपनी रक्षा में असमर्थ –दुर्बल हो और अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे पुरुष को प्राण जाने पर भी मैं नहीं छोड़ सकता ; यह मेरा सदा का व्रत है। इन्द्र ने कहा – वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, यज्ञ, स्वाध्याय और हवन आदि पुण्यकर्म करता है, उस पर यदि कुत्ते की दृष्टि भी पड़ जाय तो उसके फल को क्रोधवश नामक राक्षस हर ले जाते हैं; इसलिये इस कुत्ते का त्याग कर दो। कुत्ते को त्याग देने से ही तुम देवलोक में पहुँच सकोगे। व़ीर! तुमने अपने भाइयों तथा प्यारी पत्नी द्रौपदी का परित्याग करके अपने किये हुए पुण्यकर्मों के फलस्वरूप देवलोक को प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्ते को क्यों नहीं त्याग देते ? सब कुछ छोड़कर अब कुत्ते के मोह में कैसे पड़ गये ?

युधिष्ठिर ने कहा – भगवन ! संसार में यह निश्चित बात है कि मरे हुए मनुष्यों के साथ न तो किसी का मेल होता है न विरोध ही। द्रौपदी तथा अपने भाइयों को जीवित करना मेरे वश की बात नहीं है; अत: मर जाने पर मैंने उनका त्याग किया है, जीवितावस्था में नहीं शरण में आये हुए को भय देना, स्त्री का वध करना, ब्राह्मण का धन लूटना और मित्रों के साथ द्रोह करना – ये चार अधर्म एक और भक्त का त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझ में यह अकेला ही उन चारों के बराबर हैभक्त का त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझ में यह अकेला ही उन चारों के बराबर है। वैशम्पायनजी कहते है – जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर का यह कथन सुनकर कुत्ते का रूप धारण करके आये हुए धर्मस्वरूपी भगवान बड़े प्रसन्न हुए और राजा युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हुए मधुर वचनों द्वारा उनसे इस प्रकार बोले -। साक्षात धर्मराज ने कहा – राजेन्द्र! भरतनन्दन तुम अपने सदाचार, बुद्धि तथा सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति होने वाली इस दया के कारण वास्तव में सुयोग्य पिता के उत्तम कुल में उत्पन्न सिद्ध हो रहे हो। बेटा! पूर्वकाल में द्वैतवन के भीतर रहते समय भी एक बार मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी; जब कि तुम्हारे सभी भाई पानी लाने के लिये उद्योग करते हुए मारे गये थे |उस समय तुमने कुन्ती और माद्री दोनों माताओं में समानता की इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुन को छोड़ केवल नकुल को जीवित करना चाहा था। इस समय भी ‘यह कुत्ता मेरा भक्त है’ ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्र के भी रथ का परित्याग कर दिया है; अत: स्वर्गलोक में तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा नहीं है।

भारत ! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि तुम्हें अपने इसी शरीर से अक्षय लोकों की प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम दिव्य गति को पा गये हो। मरूद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियों ने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को रथ पर बिठाकर अपने-अपने विमानों द्वारा स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरने वाले, रजोगुणशुन्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मवाले तथा सिद्ध थे। कुरूकुलतिलक राजा युधिष्ठिर उस रथ में बैठकर अपने तेज से पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करते हुए तीव्र गति से ऊपर की ओर जाने लगे | उस समय सम्पूर्ण लोकों का वृत्तान्त जानने वाले, बोलने में कुशल तथा महान तपस्वी देवर्षि नारद जी ने देवमण्डल में स्थित हो उच्च स्वर से कहा -‘कितने राजर्षि स्वर्ग में आये हैं, वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, किंतु महाराज युधिष्ठिर अपने सुयश से उन उन सबकी कीर्ति को आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं। ‘ अपने यश, तेज और सदाचार रूप सम्प‍ित्त से तीनों लोकों को आवृत करके अपने भौतिक शरीर से स्वर्गलोक में आने का सौभाग्य पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के सिवा और किसी राजा को प्राप्त हुआ हो, ऐसा हमने कभी नहीं सुना है।



प्रभो! युधिष्ठिर! पृथ्वीपर रहते हुए अपने आकाश में नक्षत्र और ताराओं के रूप में जितने तेज देखे हैं, वे इन देवताओं के सहस्त्रों लोक हैं; इनकी ओर देखो’ |नारदजी की बात सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने देवताओं तथा अपने पक्ष कें राजाओं की अनुमति लेकर कहा ‘ देवेश्वर! मेरे भाइयों को शुभ या अशुभ जो भी स्थान प्राप्त हुआ हो उसी को मैं भी पाना चाहता हूँ। उसके सिवा दूसरे लोकों में जाने की मेरी इच्छा नहीं है’ राजा की बात सुनकर देवराज इन्द्र ने कहा युधिष्ठिर से कोमल वाणी में कहा -‘ महाराज! तुम अपने शुभ कर्मोंद्वारा प्राप्त हुए इस स्वर्ग लोक में निवास करो। मनुष्य लोक के स्नेह पाश को क्यों अभी तक खींचे ला रहे हो ?कुरूनन्दन! तुम्हें वह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है जिसे दूसरा मनुष्य कभी और कहीं नहीं पा सका। तुम्हारे भाई ऐसा स्थान नहीं पा सके हैं। ‘नरेश्वर! क्या अब भी मानवभाव तुम्हारा स्पर्श कर रहा है? राजन! यह स्वर्ग लोक है। इन स्वर्गवासी देवर्षियों तथा सिद्धों का दर्शन करो ‘। ऐसी बात कहते हुए सेश्वर्यशाली देवराज से बुद्धिमान युधिष्ठिर ने पुन: यह अर्थयुक्त वचन कहा ‘दैत्यसूदन! अपने भाइयों के बिना मुझे यहाँ रहने का उत्साह नहीं होता; अत: मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियों में श्रेष्ठ द्रौपदी गयी है।



जैसे ही युधिष्ठिर स्वर्ग पहुंचे, उन्होंने वहां कौरवों को तो देखा लेकिन उन्हें कहीं भी अपने भाई पांडव नजर नहीं आए। युधिष्ठिर को पता चला कि कर्ण समेत उसके सभी भाई नर्क में हैं।युधिष्ठिर को जब उस स्थान पर ले जाया गया जहां कर्ण और अन्य पांडव थे, तब ईश्वर से उन्होंने उनके नर्क में होने का कारण पूछ। ईश्वर ने कहा कि कर्ण ने द्रौपदी का असम्मान किया था जिसकी वजह से उसे नर्क भोगना पड़ा। भीम और अर्जुन ने धोखे से दुर्योधन की हत्या की, नकुल और सहदेव ने उनका साथ दिया जिसकी वजह से उन्हें भी नर्क में आना पड़ा।इस बात पर युधिष्ठिर क्रोधित हो उठे। उन्होंने पूछा कि जिन लोगों ने ताउम्र धर्म का पालन किया है, उन्हें तो नर्क में भेज दिया गया, तो कौरवों जैसे अत्याचारियों को स्वर्ग में क्यों रखा गया है? इस पर ईश्वर ने जवाब दिया कि अपने अंत समय तक कौरव अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते रहे। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने एक सच्चे क्षत्रिय की तरह अपने प्राण भी त्यागे, इसलिए अपने इस सुकर्मों के लिए दुर्योधन और उसके सभी भाइयों को कुछ समय के लिए स्वर्ग में रखा गया है।युधिष्ठिर के चेहरे पर उदासी का भाव देखकर ईश्वर ने उनसे कहा कि पांडवों का नर्कवास और कौरवों का स्वर्गवास कुछ समय के लिए ही है, यह उनके कर्मों के रूप में उन्हें दिया गया है। कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नर्क भोगकर कौरव नर्क और द्रौपदी समेत सभी पांडव स्वर्ग में युधिष्ठिर के पास चले गए।

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