मौन : आलौकिक प्रेम का मार्ग

मौन:

 मौन: मौन शब्द अपने आप में ही शांति का अनुभव देता है, और मौन का अभ्यास किया जाए तो यह अंतर्मन को शांत कर देता है और जब अंतर्मन शांत होता है तो स्वतः ही ध्यान होने लगता है फिर इसे करने की नहीं किन्तु अनुभव की आवश्यकता ही रह जाती है, अतः मौन का अभ्यास हमे ध्यान की और ले जाता है और आध्यात्मिक दृष्टि से मौन हमे भजन की ओर स्वतः ले जाता है भजन करना नहीं पड़ता बल्कि निरंतर हमारे भीतर होने लगता है, "सादर सुनहि ते तरहिं भव सिंधु बिनु जलयान" जैसे सूंदर कांड के लिए कहा है जो इसे सुन लेगा बिना प्रयास भव पार हो जायेंगे, ऐसे ही मौन साधना से कोई प्रयास करना ही नहीं पड़ेगा स्वतः साधना हो जाएगी,  
ईश्वर के आलोकिक प्रेम को पाने का अनुभव का सबसे सरल तरीका है मौन साधना, मौन का अर्थ न केवल मुख से मौन बल्कि मन को भी मौन करना क्योंकि हम मुँह तो बंद क्र लेंगे लकिन आँखों से हाथो से इशारो से बोलते रहते है वः सही मौन साधना नहीं है, बल्कि मन को भी चुप रखना मौन है,कोई प्रयास नहीं बीएस शांत अभ्यास से ही सम्भव है ऐसा लकिन एक बार मौन का आनंद आ गया तो फिर सब आनंद भीतर ही प्रगट हो जाएंगे,

मौन : आलौकिक प्रेम का मार्ग 


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