नाभि से नीचे धारण नहीं करना चाहिए स्वर्ण

सनातन धर्म के अनुसार स्वर्ण अर्थात सोना (GOLD ) को नाभि से नीचे धारण नहीं करना चाहिए। 
इसके लिए दो मुख्य दो कारण  है।

प्रथम कारण ,
 श्रीमद भगवद गीता में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा - पार्थ! मैं  धातुओं में स्वर्ण हूँ।  
इसलिए स्वर्ण धारण करने में मर्यदा रखनी ही चाहिए।  
द्वितीय कारण ,

भगवान् शिव का माता पार्वती के साथ पाणिग्रहण  हुआ।  पाणिग्रहण  के बाद 100 वर्ष तक वे कैलाश पर आनंद विहार करते रहे, उस 100 वर्ष के विहारोपरांत  शंकर भगवान् का एक दिव्य तेज़ प्रकट हुआ।  वह तेज़ इतना दिव्य था, इतना पराक्रमी था कि देवता भी उस से घबराने लगे।  देवताओं ने भगवान् शिवा से कहा कि यदि यह तेज़ नराकार में प्रकट हो गया तो हम तेज़हीन  हो जायेंगे, इसीलिए भगवान् आप इस तेज़ को विसर्जित कर दीजिये। शंकर भगवान् ने कहा इसे विसर्जित तो कर दे लेकिन इसे कौन स्वीकार करेगा? 



  देवताओ ने कहा कि  इसे पृथ्वी देवी स्वीकार कर लेंगी। तब भगवान् शिव ने उस दिव्य तेज़ को  पृथ्वी पर विसर्जित कर दिया।  लेकिन उस तेज़ को धरती भी सहन नहीं  सकीं, पृथ्वी ने कहा मेरी सामर्थ्य नहीं है इस तेज़ को सम्हालने की।  

                                            तब ब्रह्मा जी ने कहा कि  इस तेज़ को गंगा जी को दीजिये (गंगा जी  पार्वती की बहन मानी गई हैं। ) श्री गंगा जी से कहा गया की आप इसे धारण कीजिये , गंगा जी ने धारण किया लेकिन गंगा जी भी बोली कि  मैं इसे सहन नहीं कर सकती। 
तब सब देवताओं ने कहा कि   आप नहीं सम्हाल सकतीं तो  इसे  छोड़िये जिसके बाद वह दिव्य तेज़  गंगा जी से वन में और पर्वत  में  बिखर गया ।  वन पर्वत में बिखरने के पश्चात  वह   सूर्य कि  भांति चमकने लगा। 
भगवान् शिव का सूर्य के समान  चमकता हुआ दिव्य तेज़  ही  स्वर्ण के रूप  प्रतिष्ठित हुआ है।   
 इस लिए स्वर्ण को सामान्य  धातु न समझ कर इसके देवत्व को  स्वीकार कर के मर्यादा पूर्वक स्वर्ण को धारण करना चाहिए। 
श्री राधाकृष्ण जी महाराज 

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