केंचुओं ने गांधारी से कैसे बदला लिया ? Acharya Shri Pundrik Goswami Ji Maharaj



गांधारी की कथा बड़ी विचित्र है। गांधारी ने अपने बच्चों को अंतिम समय तक नहीं देखा था
जब वे परलोक  सिधार  गए तब उसने धृतराष्ट्र से पूछा, हे ! स्वामी आपकी आज्ञा हो तो तो कम से कम मरने के बाद अपने  बच्चों को देख सकती हूँ?
                   गांधारी रणभूमि में पहुंची उसने आँखों की पट्टी खोली , सबसे पहले उसकी नज़र एक बेर के वृक्ष पर गई , उस पर एक बेर लगा हुआ था देखने में ही बड़ा स्वादिष्ट था।  मन में ख्याल आया बड़े दिन बाद  बेर देखा है, बच्चे तो मर ही गए कुछ  समय बाद देख लूंगी और शास्त्र  कहता है बुभुक्षितः किं न करोति पापं  
भूखा व्यक्ति कौन सा पाप नहीं करता?
                         बेर तोड़ने के लिये उसने हाथ बढ़ाया लेकिन बेर उसके हाथ आया नहीं, वो चौंकी "अब मैं क्या करूं ?" उसने देखा शव पड़ा था।  उसने पहला शव खींचा शव के ऊपर खड़ी हुई लेकिन बेर उसके हाथ नहीं आया।  कहते है उसने सौ शव लगा कर पर्वत बना लिए और उसके ऊपर खड़े हो कर बेर तोड़ कर खाया, वाह ! क्या स्वाद है।  ठाकुर जी वहीं  खड़े थे , ताली बजा कर हँसे। गांधारी ने पूछा कृष्ण आप हँसे  क्यों ? कृष्ण ने कहा आप यहाँ की क्या कर रहीं हैं ? मैं बेर खा रही थी , मैं अपने बच्चों को देखने आयी थी. आपने तो मेरे पुत्र देखे हैं बताओ मेरा पुत्र दुर्योधन कहाँ है?

कृष्ण ने गांधारी  से कहा तू उसकी छाती पर खड़ी  है वो तेरे पैरों के नीचे  है।  
गांधारी रो पड़ी उसने कहा भगवान् मैं  योगिनी हूँ मैं अपने  सौ पूर्व जन्मो को देख सकती हूँ और उन सौ जन्मो में मैंने ऐसा कोई कर्म  नहीं  किया जिससे मुझे इतना बड़ा कष्ट हो। 

श्री कृष्ण कहते है तुझ में और मुझ में यही भेद है  , तू सौ जन्म देख सकती है मैं अनंत जन्म  देख सकता सकता हूँ. तुझे पता है ? तू अपने एक सौ एक वें  जन्म में एक राजकुमारी थी तेरे सिर में  बहुत दर्द रहता था।  एक व्यक्ति   तेरे पास आया उसने कहा मैं तुझे दवाई दे सकता हूँ परन्तु दवाई थोड़ी हिंसक है , तूने कहा महाराज जो भी   दवाई हो वो दो लेकिन  दर्द ठीक करो. तब उस व्यक्ति ने  एक दवाई बनाई उस दवाई  को बनाने में एक हिंसा थी कि  उसमे सौ केंचुओ का प्रयोग हुआ  100  केंचुओं  को कूटा गया था और उसका  मलहम तैयार  किया , कृष्ण कहते गांधारी तूने उस मलहम को अपने माथे पर लगाया था।  वह सौ केंचुए तेरे पिछले सौ जन्मों से अपना प्रतिशोध लेने की प्रतीक्षा कर रहे थे पर तेरी साधना इतनी प्रबल थी कि  ये तेरे शत्रु बन कर तो प्रतिशोध न ले सके इसलिए ये तेरे पुत्र बने और मर कर मुक्त हो गए और पुत्रों की मृत्यु का भयंकर  कष्ट तुझे हो रहा है। 
आचार्य श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज 

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