पितरों को श्रद्धा का अर्पण।कूर्म पुराण के श्राद्ध प्रकरण के अनुसार विभिन्न दिनों को किए गए श्राद्ध का पुण्य फल

ब्रह्मपुराण के श्राद्ध प्रकाश में कहा गया है कि  जो उचित काल, पात्र, एवं स्थान के अनुसार,शास्त्रोचित  विधि से पितरों को लक्ष्य कर के श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध है।  मनुस्मृति के अनुसार मनुष्य के तीन पूर्वज - पिता, पितामह और प्रतिपामह क्रम से वसुओं, रुद्रों एवं आदित्यों के समान हैं और श्राद्ध करते समय इनको   पूर्वजों का प्रतिनिधि माना गया है।

ऋग्वेद में पितृगण निम्न, मध्यम  और उच्च, तीन श्रेणियों के बताये गए हैं। तैतरीय ब्राह्मण में उल्लेख है कि पितर जिस लोक में निवास करते हैं , वह भू-लोक और अंतरिक्ष के बाद  है।  पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक हम जो कुछ अर्पण करते हैं, उसे अग्निदेव उनके निकट तक पहुँचा देते हैं, तभी तो सूर्यास्त के बाद यह अनुष्ठान नहीं किया जाता।  बौधायन धर्मसूत्र में वर्णन है कि जो पितृ कर्म करता है, उसे दीर्घायु, स्वर्ग, यश और समृद्धि प्राप्त होती है।

  ऐसे तो भारत में कितने ही तीर्थों  पर श्राद्ध, पिण्डदान किया जाता है, लेकिन गयाजी को सब से उत्तम माना गया है।  वशिष्ठ धर्मसूत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि  कृषक जैसे अच्छी वर्षा से प्रसन्न होते हैं, वैसे ही गया में पिण्डदान  से पितर प्रसन्न होते हैं।
नारद पुराण के उत्तर  भाग में वर्णन है - हे! सुभाग्ये महापापकर्ता पातकी भी, जो पितृ कर्म का अधिकार रखता हो, गया के दर्शन व वहां श्राद्ध  करने से ब्रह्मलोक पा जाता है। 

विष्णु के जाग्रत तीर्थ गया में पुरे वर्ष भर पिंडदान होता रहता है, लेकिन प्रत्येक वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक का काल, जिसे पितृपक्ष कहा जाता है, में गया में अनुष्ठान का विशेष महत्व है।  इस अवधि में पितृगण 'गया श्राद्ध' के लिए आस लगाए रहते हैं।  गया में किया गया श्राद्ध लोक और परलोक दोनों के लिए सुखकारी है।

कूर्म पुराण के श्राद्ध प्रकरण के अनुसार विभिन्न दिनों को किए गए श्राद्ध का पुण्य फल:-

सोमवार    -  सौभाग्य वृद्धि 
मंगलवार  - संतति प्राप्ति 
बुधवार      - शत्रुनाश 
गुरुवार      - धन प्राप्ति 
शुक्रवार     - समृद्धि प्राप्ति 
शनिवार    - आरोग्य सुख 
रविवार     - यश प्राप्ति 

तिथि व  दिन  के अनुसार श्राद्ध का पुण्य फल 
प्रतिपदा            -           धनलाभ
द्वितीय            -           आरोग्य
तृतीया              -           संतति प्राप्ति
चतुर्थी               -           शत्रुनाश
पंचमी               -           लक्ष्मी प्राप्ति
षष्ठी                -           पूज्यता प्राप्ति
सप्तमी             -           गणों का आधिपत्य
अष्टमी             -           उत्तम बुद्धि की प्राप्ति
नवमी               -           उत्तम स्त्री की प्राप्ति
 दशमी              -           कामना पूर्ति
एकादशी           -           वेद ज्ञान की प्राप्ति
द्वादशी                  -           सर्वत्र विजय
त्रयोदशी            -           दीर्घायु
चतुर्दशी            -           अपघात से हुए मृतकों की तृप्ति
अमावस्या        -           कामना पूर्ति   स्वर्ग प्राप्ति


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