विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि रचना


विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि रचना

The-creation-according-to-Vishnu-Purana

हे द्विज ! परब्रह्म का प्रथम रूप पुरुष है, अव्यक्त (प्रकृति) और व्यक्त (महदादि) उसके अन्य रूप हैं तथा काल उसका परमरूप है | भगवान् विष्णु जो व्यक्त, अव्यक्त, पुरुष और काल रूप से स्थित होते हैं, इसे उनकी बालवत क्रीड़ा ही समझो | उनमें से अव्यक्त कारण को, जो सदसद्रूप और नित्य है, श्रेष्ठ मुनिजन प्रधान तथा सूक्ष्म प्रकृति कहते हैं | यह क्षयरहित है, उसका कोई अन्य आधार भी नहीं है तथा अप्रमेय, अजर, निश्छल, शब्द-स्पर्शादि शून्य और रूपादिरहित है | वह त्रिगुणमय और जगत का आकार नही तथा स्वयं अनादि एवं उत्पत्ति और लय से रहित है | यह सम्पूर्ण प्रपंच प्रलयकाल से लेकर सृष्टि के आदि तक इसी से व्याप्त था | इसी अर्थ को लक्ष्य करके प्रधान के प्रतिपादक इस श्लोक को कहा करते हैं – ‘उस समय न दिन था, ना रात्रि थी, न आकाश था, ना पृथ्वी थी, न अन्धकार था, न प्रकाश था और न इनके अतिरिक्त कुछ और ही था | बस एक प्रधान ब्रह्म और पुरुष ही था |




विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि रचना कैसे हुई



हे विप्र ! विष्णु के परम (उपाधिरहित) स्वरूप से प्रधान (प्रकृति) और पुरुष – ये दो रूप हुए; उसी के जिस अन्य रूप के द्वारा ये दोनों संयुक्त और वियुक्त होते हैं, उस रूपांतर का ही नाम काल है |
सर्गाकाल के प्राप्त होने पर गुणों की साम्यावस्था (सत, रज और तम की समान मात्रा) रूप प्रधान (प्रकृति) जब विष्णु के क्षेत्रज्ञ रूप से अधिष्ठित हुआ (दोनों के संयुक्त होने से) तो उससे महत्तत्व की उत्पत्ति हुई | महत्तत्व तीन प्रकार का हुआ – सत, रज और तम | तीनों महत्तत्वों से तीन अहंकार उत्पन्न हुए – सत, रज और तम | तामस अहंकार से शब्द तन्मात्रऔर आकाश उत्पन्न हुआ | आकाश से स्पर्श तन्मात्र उत्पन्न हुआ | स्पर्श तन्मात्र से वायु उत्पन्न हुआ | वायु ने रूप तन्मात्र को रचा | जिससे तेज (अग्नि) उत्पन्न हुई | तेज से रस तन्मात्र की उत्पत्ति हुई | रस तन्मात्र से जल उत्पन्न हुआ | जल से गंध तन्मात्र की उत्पत्ति हुई | गंध तन्मात्र से पृथ्वी उत्पन्न हुई | (तो इस प्रकार आकाश का गुण हुआ शब्द, वायु का गुण स्पर्श, अग्नि का तेज और पृथ्वी का गंध) ये सब तामस अहंकार से उत्पन्न हुआ |

राजस अहंकार से दस इन्द्रियाँ और सात्विक अहंकार से उनके अधिष्ठाता देवता और एक मन उत्पन्न हुए | इन उपरोक्त सभी ने मिलकर विष्णु से अधिष्ठित (के आधार) तथा प्रधान (अव्यक्त प्रकृति) के अनुग्रह से अंड की उत्पत्ति की | अव्यक्त स्वरूप जगत्पतिविष्णु व्यक्ति हिरण्यगर्भ रूप से स्वयं ही विराजमान हुए | वे विष्णु ब्रह्मा होकर रजोगुण का आश्रय लेकर इस संसार की रचना में प्रवृत्त होते हैं | तथा रचना हो जाने पर सत्वगुण विशिष्ट अतुल पराक्रमी भगवान् विष्णु उसका कल्पान्तपर्यंत युग-युग में पालन करते हैं | फिर कल्प का अंत हो जाने पर अति दारुण तम: प्रधान रूद्र रूप धारण कर वे जनार्दन विष्णु ही समस्त भूतों का भक्षण कर लेते हैं | इस प्रकार समस्त भूतों का भक्षण कर संसार को जलमय करके वे परमेश्वर शेष-शय्या पर शयन करते हैं |



सृष्टिस्थित्यंतकरणीम ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम | स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दन: || ६६


वह एक ही भगवान् जनार्दन जगत की सृष्टि, स्थिति और संहार के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव – इन तीन संज्ञाओं को धारण करते हैं |


प्रथम अंशे, द्वीतीय अध्याय, विष्णु पुरा

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