मृत्यु काल में क्या अनुभव होता है

 जय श्री हरि

मृत्यु काल में क्या अनुभव होता है :


मृत्यु काल में क्या अनुभव होता है :


हे पक्षिन ! जब मृत्यु आ जाती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोग (संयोग) से कोई रोग प्राणी के शरीर में उत्पन्न हो जाता है | इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं और बल, ओज तथा वेग शिथिल हो जाता है | हे खग ! प्राणियों को करोड़ों बिच्छुओं के एक साथ काटने का जो अनुभव होता है, उससे मृत्युजनित पीड़ा का अनुमान करना चाहिए | उसके पश्चात् ही चेतनता समाप्त हो जाती है, जड़ता आ जाती है | तदनंतर यमदूत उसके समीप आकर खड़े हो जाते हैं और उसके प्राणों को बलात अपनी और खींचना शुरू कर देते हैं | उस समय प्राण कंठ में आ जाते हैं | मृत्यु के पूर्व मृतकका रूप बीभत्स (डरावना) हो उठता है | वह फेन उगलने लगता है | उसका मुंह लार से भर जाता है | उसके पश्चात् शरीर के भीतर विद्यमान रहने वाला वह अंगुष्ठ परिणाम का पुरुष हाहाकार करता हुआ तथा अपने घर को देखता हुआ यमदूतों के द्वार यमलोक ले जाया जाता है |

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                                         मृत्यु के समय शरीर में प्रवाहित वायु प्रकुपित होकर तीव्र गति को प्राप्त करता है और उसी की शक्ति से अग्नितत्व भी प्रकुपित हो उठता है | बिना ईंधन के प्रदीप्त ऊष्मा (गर्मी) प्राणी के मर्मस्थानों का भेदन करने लगती हैं, जिसके कारण प्राणी को अत्यंत कष्ट की अनुभूति होती है | परन्तु भक्तजनों एवं भोग में अनासक्त जनों की अधोगति (दुर्गति) निरोध करने वाला (रोकने वाला) उदान नामक वायु ऊर्ध्वगति वाला हो जाता है |
 जो लोग झूठ नहीं बोलते, जो प्रीति (प्रेम) का भेदन नहीं करते, आस्तिक और श्रद्धावान हैं, उन्हें सुखपूर्वक मृत्यु प्राप्त होती है | जो काम, ईर्ष्या और द्वेष के कारण स्वधर्म का परित्याग न करे, सदाचारी और सौम्य हो, वे सब निश्चित ही सुखपूर्वक मरते हैं |


 जो लोग मोह और अज्ञान का उपदेश देते हैं, वे मृत्यु के समय महान्धकार में फँस जाते हैं | जो झूठी गवाही देने वाले, असत्यभाषी, विश्वासघाती और वेदनिन्दक हैं, वे मूर्च्छारूपी मृत्यु को प्राप्त करते हैं | उनको ले जाने के लिए लाठी एवं मुद्गर से युक्त दुर्गन्ध से भरपूर एवं भयभीत करने वाले दुरात्मा यमदूत आते हैं | ऎसी भयंकर परिस्थिति को देखकर प्राणी के शरीर में भयवश कम्पन होने लगता है | उस समय वह अपनी रक्षा के लिए अनवरत माता-पिता और पुत्र को यादकर करुण-क्रंदन करता है | उस क्षण प्रयास करने पर भी ऐसे जीव के कंठ से एक शब्द भी स्पष्ट नहीं निकलता | भयवश प्राणी की आँखें नाचने लगती हैं | उसकी सांस बढ़ जाती है और मुंह सूखने लगता है | उसके पश्चात् वेदना से आविष्ट होकर वह अपने शरीर का परित्याग करता है और उसके पश्चात् ही वह सबके लिए अस्पृश्य एवं घृणायोग्य हो जाता है |
- धर्मकांड, प्रेतकल्प, अध्याय २

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