Gopi : गोपी आत्मभाव





गोपी शब्द का अर्थ है गो=इन्द्रियां और पी = दमन या पी लिया अर्थात गोपिया कोई साधारण ब्रिजगोपाला या गोपांगनाये नही है जो गोपियो को केवल साधारण स्त्रियां समझे वह मूरख है ।
गोपिया तो वह महात्मा है जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है या यह कह सकते है जिन महापुरुषो ने जन्मो जन्मो तक अपनी इन्द्रियों का दमन किया सभी प्रकार की इंद्रिजनित वासनाओ को कुचल डाला और केवल और केवल एक ही वासना का पालन किया जो है गोबिंद मिलन की वासना, यह गोबिंद मिलन को वासना कहने का तातपर्य केवल इतना ही है की गोपी वासना रहित नही थी तभी तो गोपी बनी यदि कोई वासना,इच्छा,उत्कंठा, चाह या सकामता अपने हृदय में नही रखती तो आज गोपी बनकर गोबिंद के लिए क्यों तड़पती? इसलिए कहने का भाव है की गोपांगनाओं की जो व्यथा गोपीगीत के माध्यम से अविरल अश्रु धारा के रूप में प्रवाहित हुयी है वह केवल इसी जनम की व्यथा नही है अपितु अनेकानेक महात्माओं की अनेकानेक जन्मो की अनेकानेक तपस्या अनेकानेक त्याग ही नही अपितु अनेकानेक व्यथाओं का सागर है जोकि गोपीगीत के रूप में प्रवाहित हुआ है, यह गीत भी कोई साधारण गीत नही है जैसाकि कहा यह व्यथाओं की, यह जन्मों जन्मों की विरहाग्नि का ताप है,यह यह वह तड़प है जिसे एक प्रेमिका अपने प्रेमी के विरह में महसूस करती है, यह वह वेदना है जो अपने प्रेमी से बिछुडन इस बिछोह होने पर कोई प्रेमिका महसूस करती है, यह वह वेदना है जैसे किसी मीन अर्थात मछली को जल से बाहर निकल दिया हो, यह वह विरह वेदना है जिसे चकोर सहन करता है, यह वेदना इतनी पीड़ादायक है की शब्दो में वर्णित नही हो सकती इसे तो केवल विरहातुर हृदय ही जानता है।
( विकास अग्रवाल)

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